दहेज कानून द्वारा पीड़ित पुरुष की आत्मकथा

कानूनी आतंकवाद के साथ मेरा संघर्ष

क्या गलत हुआ……

हमने अपने पैतृक स्थान मैंगलोर में विवाह किया और लगभग एक हफ्ते के बाद मैं बॉम्बे में जहाँ काम कर रहा था वहां वापस आ गया |

फिर मैं उसे जानने की कोशिश करने लगा |

उसको खाना बनाना नहीं आता था न ही वह कभी रसोई में जाती थी और तो और वह प्याज भी धो कर काम में लेती थी तब तो आप सोच सकते हैं कि वह खाना पकाने के बारे में कितना जानती होगी |

मैं भाग्यशाली हूं कि उसने खाने में डालने से पहले नमक नहीं धोया |

मैंने उसे बताया कि ये सब रसोई सम्बंधित काम कैसे करना है अर्थात खाने में कितना नमक और चीनी मिलानी है आदि, लेकिन उसने जो कुछ भी पकाया, मैंने बिना शिकायत किए खाया फिर चाहे वह खाना जल गया हो या उसका स्वाद कम हो गया हो या बेस्वाद ही क्यों न हो |

हमारी विवाह के दूसरे सप्ताह में, जब वह घर की साफ सफाई कर रही थी तब मैंने उसे बताया कि कैसे साफ सफाई करना है और कैसे पोछा लगाना है |

मैं उसे ये सब घरेलु काम काज सीखा रहा था लेकिन वह मुझ से नाराज हो रही थी और सोच रही थी की मैं उसके हर काम में गलतियां ढूंढ रहा हूँ

उसकी सोच ऐसी थी कि, उसको हमारे घर का काम गुलामी जैसा प्रतीत हो रहा था |

अर्थात उसको लग रहा था की में उससे घरेलु काम करवा कर गुलाम बनाना चाहता हूँ |

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